श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर हुलासगंज के पूज्य पाद श्री स्वामी जी महाराज ने अयोध्या में कैसे सरजू जी आयीं, इस पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि- शंखासुर नामक राक्षस के द्वारा वेदों का अपहरण होने पर ब्रह्मा जी बहुत दुखी थे तभी भगवान ने मत्स्य रूप धारण करके शंखासुर को मार दिया, और वेदों को वहां से लेकर ब्रह्मा जी को समर्पित कर दिया।
वेदों को प्राप्त होने पर ब्रह्मा जी को विशेष आनंद मिला। आनंद मग्न ब्रह्मा जी को देखकर भगवान नारायण के नेत्रों से आनंद की अश्रु निकल पड़ी। भगवान के उन आनंदाश्रुओं की बूंदों ने एक पवित्र नदी का रूप धारण कर लिया, वही मानसरोवर के रूप में परिणत हो गई। अयोध्या का निर्माण कराने वाले महात्मा वैवस्वत मनु को यज्ञ करने की इच्छा हुई उन्होंने अपने गुरु वशिष्ट से परामर्श किया। वशिष्ठ जी ने कहा कि यहां ना कोई पवित्र तीर्थ है, और ना ही कोई नदी। यज्ञ वहीं करना चाहिए, जहां पवित्र तीर्थ या नदी हो, यदि आपको अयोध्या में यज्ञ करने की इच्छा है तो मानसरोवर से सुंदर तथा पापों को नष्ट कर देने वाली एक नदी यहां ले आइये।
गुरु के वचन सुनकर राजा वैवश्वत मनु ने बड़े भारी धनुष पर बाण चढ़ाकर मानसरोवर तट का भेदन किया उसमें से एक नदी निकली जो अयोध्या होती हुई महासागर में जाकर मिल गई। वाण को शर कहते हैं उस शर के द्वारा लाई जाने के कारण उस नदी का नाम सरयु हुआ, या ऐसा कहा जाता है की सरोवर से निकलने के कारण सरयु नाम पड़ा। वही सरजू तट पर अयोध्या में यज्ञ हुए और वहीं वैवश्वत मनु के वंश का विस्तार हुआ जिसमें भगवान श्री राम का अवतार हुआ। भगवान राम कुछ ही दिन में पुनः अयोध्या में विराजेंगे। इसलिए जब तक मंदिर निर्माण कार्य पूरा नहीं हो जाता तब तक भगवान श्री राम का संकीर्तन अवश्य करते रहें।

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