हुलासगंज —लक्ष्मी नारायण मंदिर के मठाधीश स्वामी रंग रामानुजाचार्य जी महाराज ने श्री वामनावतार के बारे में विस्तार पूर्वक बताते हुए कब एवं कैसे करें व्रत करे उन्होंनेबताया प्रहलाद जी का पोता बली समस्त भूमंडल के राज्य के साथ-साथ देव लोक स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। गुरु बृहस्पति के आदेशानुसार सब देवता स्वर्ग छोड़कर हट गए थे।
कश्यप की पत्नी अदिति की प्रार्थना पर उसके गर्व से भाद्रपद शुक्ल पक्ष की द्वादशी को श्रवण नक्षत्र से युक्त मध्याह्न में भगवान वामन के रूप में प्रकट हुए थे। उस समय भगवान के चार भुजाएं थे। उनमें वे शंख, चक्र , गदा, कमल धारण किए हुए थे । कमल के समान कोमल और बड़े-बड़े नेत्र थे। पीतांबर शोभायमान हो रहा था। विशुद्ध श्याम वर्ण का शरीर था। मकराकृत कुंडलो की कांति से मुख कमल की शोभा और भी उल्लसित हो रही थी।
वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिन्ह, उनके कंठ में कौस्तुभ मणि सुशोभित हो रही थी। सभी वैष्णव भक्त भाद्रपद शुक्ल पक्ष द्वादशी को मध्याह्न तक उपवास करते हैं। तदनंतर भगवान की उपासना करते हैं। और भगवान का मधुर प्रसाद भोग लगाकर भक्तों के बीच वितरण कर स्वयं भी प्रसाद ग्रहण करते हैं। वामन भगवान द्वादशी को मध्यान्ह में अवतार लिए थे। इसलिए दोपहर तक ही यह व्रत किया जाता है ।
श्रवण द्वादशी एकादशी संयुक्त पूर्व विद्धा का ही व्रत वैष्णव को करना चाहिए। यदि एकादशी और द्वादशी दोनों से श्रवण नक्षत्र का संबंध हो जाए तो वह विष्णु श्रृंखला नाम का योग होता है। यह विष्णु कि सायुज्य मुक्ति फल देने वाला है। एकादशी या द्वादशी को यदि उत्तराषाढ़ा नक्षत्र हो तो उस दिन वामन द्वादशी व्रत ना करें। यह असुरों का दिन है । उदयव्यापिनी श्रवणा द्वादशी का व्रत करना चाहिए। परंतु वह यदि उत्तराषाढ़ा से विद्ध हो तो, क�

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