गुरु और शिष्य के बीच दुराव और स्वार्थ का व्यवधान आदान-प्रदान में प्रमुख बाधा बना रहता है— श्री स्वामी जी महाराज

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1918
Shri Swami jee maharaj

श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर हुलासगंज के पूज्य पाद श्री स्वामी रंग रामानुजाचार्य जी महाराज ने भक्तों को उपदेश देते हुए कहा कि- भक्त और भगवान के बीच और गुरु और शिष्य के बीच जो दुराव और स्वार्थ का व्यवधान होता है वही आदान-प्रदान में प्रमुख बाधा बना रहता है। उन्होंने एक छोटी सी कथा के माध्यम से कहा कि एक सिद्ध पुरुष के पास पारस पत्थर था। पारस पत्थर का यह गुण है कि वह जिस किसी लोहे की वस्तु में स्पर्श होता है तो वह लोहा स्वर्ण में परिवर्तित हो जाता है। सिद्ध पुरुष का एक वरिष्ठ शिष्य था जो उसे हथियाने की फिराक में लगा रहता था। जैसे तैसे करके उसने गुरु जी को प्रसन्न करके उसे प्राप्त करने का रास्ता बना लिया। पत्थर छिपाकर रखा गया था।

जब देने का समय आया तो गुरु जी ने एक सीलबंद लोहे की पेटी उठा लाने का निर्देश दिया। शिष्य उसे उठा कर लाया। पारस पत्थर उसी में था। चाबी ना मिलने पर ताला तोड़ने का प्रयास होने लगा। शिष्य ने संदेह व्यक्त करते हुए कहा यदि इसमें असली पारस रहा होता तो यह लोहे की पेटी कब की सोने की हो गई होती। गुरु कुछ बोले नहीं। ताला तोड़ने पर पारस निकाला गया। वह कपड़े में लपेटा हुआ था। लोहे के साथ उसका संपर्क बन नहीं सकता था। दोनों के बीच का व्यवधान ही अभीष्ट परिणाम होने नहीं दिया। अध्यात्म प्रसंग की चर्चा में 1 दिन गुरु ने उस बात का उल्लेख किया, और कहा कि भक्त और भगवान के बीच, गुरु और शिष्य के बीच दुराव और स्वार्थ का व्यवधान ही आदान-प्रदान में प्रमुख बाधा बना रहता है। जब तक यह माया रुपी व्यवधान हटे गा नहीं तब तक भक्तों को भगवान और शिष्य को सच्चे गुरु नहीं प्राप्त हो सकते।

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