श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर हुलासगंज के श्री स्वामी रंग रामानुजाचार्य जी महाराज ने उपदेश करते हुए बताया कि एक बार नारद जी द्वारिका पुरी भगवान के वैभव को देखने के लिए गए। वहां नारद जी ने प्रत्येक राजमहल में रानियों के साथ विभिन्न प्रकार के कर्मों को करते हुए भगवान श्री कृष्ण को देखा। उनमें कहीं यज्ञ कुंडों में हवन करते हुए, कहीं आराधना करते हुए , कहीं संध्या करते हुए, कहीं मंत्र जपते हुए, इस तरह भगवान गृहस्थ को पवित्र करने वाले श्रेष्ठ धर्मों का आचरण कर रहे थे। भगवान को जब नारद जी ने यह सब करते हुए देखा तो उन्हें भ्रम हुआ। तब उन्होंने भगवान से पूछा कि प्रभु आप सभी को अभीष्ट फल देने वाले हैं। स्वर्ग, नर्क, बैकुंठ यह सब आप के अधीन हैं। आप ही सभी को कर्म के अनुसार फल देने वाले हैं, फिर आप क्यों पूजा पाठ करते हैं।
भगवान ने कहा कि सामान्य जनों को कर्म मार्ग में प्रवृत्त कराने के लिए मैं यह सभी कर्म का पालन करता हूं। क्योंकि लोग मुझे महान समझते हैं और महान पुरुषों के अनुकरण सामान्य जन करते हैं। इसलिए संसार को धर्म की शिक्षा देने के लिए मैं इस प्रकार धर्म का आचरण करता हूं। जब गृहस्थों को गीता की बात कह कर संध्या वंदन आदि कर्म करने के लिए उपदेश किया जाता है, तो बहुत से लोग कह देते हैं की हम लोग गृहस्थ हैं हम लोगों छुट्टी ही कहां है की पूजा पाठ करें। परन्तु उन्हें यह विचार करना है की विशेष धर्मों के आचरण गृहस्थों के लिए ही कहे गए हैं। इसीलिए भगवान श्री कृष्ण ने गृहस्थ होकर हैं पूर्वोक्त धर्मों का पालन लोक शिक्षार्थ किया है। जो सच्चे त्यागी, साधु, सन्यासी हैं उन्हें तो शुभ अशुभ कर्म का फल मिलता ही नहीं। अतः यह प्रशन गृहस्था के लिए विशेष शिक्षाप्रद है।

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