श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर हुलासगंज के पूज्य पाद श्री स्वामी जी महाराज ने अयोध्या में आराध्य श्री रंगनाथ भगवान कैसे आए थे और वहां से कैसे दक्षिण भारत श्रीरंगम में गए, इस पर बताते हुए उन्होंने कहा कि श्री अयोध्या के आदिदेव श्री रंगनाथ भगवान थे जो नारायण या विष्णु शब्द से कहे गए हैं।
भगवान नारायण ने अपनी नाभि कमल से उत्पन्न कर ब्रह्मा का सृजन किया। ब्रह्मा जी ने कमल का आधार ढूंढने का बहुत प्रयास किया, परंतु उन्हें पता नहीं चला। भगवान विष्णु ने उन्हें आकाशवाणी द्वारा बतलाया कि तुम तप करो। ब्रह्मा की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान नारायण ने समस्त वेदों का ज्ञान कराकर सृष्टि का विस्तार करने के लिए आज्ञा दी। ब्रह्मा ने कहा कि सृष्टि विस्तार करने में माया से लिप्त ना हो सकें इसके लिए मुझे कुछ आधार दीजिए।
भगवान ने प्रणवाकार (ओंकार की आकृति) के एक वृहद विमान में शेषशय्या पर लेटे हुए ब्रह्मा को दर्शन दिया। ब्रह्मा जी विमानस्थ नारायण को विधिवत पूजन करने लगे। उस लम्हा से मरीचि, मरीचि जी से कश्यप, कश्यप से विवस्वान, और विवस्वान से वैवस्वत मनु की उत्पत्ति हुई। वैवस्वत मनु के के पुत्र इक्ष्वाकु हुए उन्होंने कठोर तप करके ब्रह्मा को प्रसन्न किया और विमान में स्थित रंगनाथ भगवान को मांग कर अयोध्या ले आये। उसी दिन से अयोध्या में भगवान श्री रंगनाथ (नारायण) की पूजा होने लगी। इक्ष्वाकु महाराज से लेकर राजा दशरथ तक चक्रांकित श्री वैष्णव थे। अतः एक छक्का इक्ष्वाकु से लेकर सभी राजागण विमानस्थ श्री रंगनाथ के विधिवत पूजन करते थे। जब भगवान श्री राम अयोध्या से वैकुंठ जा रहे थे तब उन्होंने विभीषण के कहने पर भगवान रंगनाथ को उन को सौंप दिया भगवान रंगनाथ ने कहा कि जहां तुम मुझे रख दोगे वही मैं स्थापित हो जाऊंगा।

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