श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर हुलासगंज के श्री स्वामी रंग रामानुजाचार्य जी महाराज इन दिनों समाचार पत्र के माध्यम से भक्तो तक अपनी उपदेश को पहुंचा रहे हैं। साथ ही मंदिर प्रांगण में झूलनोत्सव का कार्यक्रम चल रहा है। जिसमें भक्तों से आग्रह कर भीड़ भाड़ नहीं लगाया जा रहा। उन्होंने अपने प्रसंग में कहा की मानव एक विवेकशील प्राणी है। इसके प्रत्येक कर्म विवेकशीलता की आवश्यकता है। विवेक हीन मानव पशु-पक्षी आदि से भी हीनतर माना गया है। सुख दो प्रकार के होते हैं। इस लोक का और परलोक का। लोक का सुख धर्म से उत्पन्न होता है, और परलोक का सुख ईश्वर की उपासना से। भगवान के पांच स्वरूप हैं। पर,व्युह, वैभव, अर्चा और अंतर्यामी इसमें सर्वविध उपासना के योग्य केवल अर्चा स्वरूप ही हैं।
अर्चारूप में भगवान अधिक सुलभ सुगम एवं उपादेय हैं। वे सर्वदेश सर्वकाल और सभी अवस्थाओं में भक्तों से सेवा पूजा ग्रहण कर कल्याण करते हैं। जैसे बिजली की लाइन सर्वत्र फैली हुई है, अव्यक्त रूप में उसकी शक्ति सर्वत्र है, परंतु प्रकाश हमें तारगत अव्यक्त विद्युत शक्ति से नहीं मिलता। उसके लिए बल्ब की आवश्यकता होती है। उसी प्रकार भगवान अव्यक्त रूप में सर्वत्र हैं। परंतु हमें विशेष ज्ञान शक्ति आदि गुणों का प्रकाश अर्चा मूर्ति से ही मिलता है। अर्चन पूजन, पाद- सेवन, वंदन, संकीर्तन, स्तुति, प्रदक्षिणा, प्रार्थना, आदि क्रियाएं मूर्ति के समक्ष ही संभव है। शास्त्रों में मंदिर निर्माण करना, उसमें भगवत्मूर्ति की स्थापना करना। उनके लिए पूजा एवं भोग सामग्रियों की व्यवस्था करना आदि भगवत संबंधी कल्याण के साधन बतलाए गए हैं।

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