मन की शांति चाहिए तो करें गीता का अध्ययन : श्री स्वामी जी महाराज

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Swami Ji Mharaj

श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर हुलासगंज के मठाधीश श्री स्वामी रंग रामानुजाचार्य जी महाराज इन दिनों सोशल मीडिया व समाचार पत्र के माध्यम से भक्तों के लिए प्रवचन दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि मानव को अपने मन की शांति चाहिए तो गीता का पाठ एवं अध्ययन अवश्य करना चाहिए । उन्होंने एक पद को गाते हुए कहा कि–

पाठ गीता का करना सदा कुलोचित कर्म है।
शब्द गीता का सुमिरना ही सनातन धर्म है।।
चित्त में श्रीकृष्ण का सिद्धांत धरना चाहिए।
मानवों को नित्य गीता पाठ करना चाहिए।।

आगे गीता के महत्व को बताते हुए उन्होंने कहा कि गीता परम रहस्य में ग्रंथ है। इसमें संपूर्ण वेदों का सार संग्रह है। यह साक्षात परमात्मा की दिव्य वाणी है। इतिहास पुराण आदि में सर्वत्र इसकी महिमा गायी गयी है। गीता में सारे शास्त्रों का सार भरा हुआ है। इसलिए सर्वशास्त्रमयी कही गई है। यह एक निर्मल हीरा है। इसमें विश्व रचयिता परमेश्वर के सृजित प्रत्येक वस्तु के यथार्थ स्वरूप का स्थूल तथा सूक्ष्म रूप से चित्रण किया गया है। भगवान के अव्यक्त रूप से विश्वरूप तक की दिव्य झांकी गीता में मिलती है।

गीता भगवान के अनंत एवं कल्याणमय गुणों की तथा दिव्य विभूतियों का प्रत्यक्ष दर्शन कराती है। गीता की महिमा को बतलाना सामान्य जनों के लिए समुद्र की गहराई बताने के समान है। इसलिए भगवान स्वयं दुहने वाले गोप बने और अर्जुन को बछड़ा बनाकर उपनिषद रूप गौ से उसके सारतत्व गीता रूप अमृतमयी दूध का दोहन किया।

मानव धर्म के मूल तत्व को समझा देने वाला गीता के समान विश्व में दूसरा कोई ग्रंथ नहीं है। यह एक शरीर में ही ब्रह्मांड की सभी चीजों का दर्शन करा देती है। मानव की सारी समस्याओं का समाधान गीता से मिल जाता है। संसार के विभिन्न कष्टों से पीड़ित मानवों को आनंद में सागर में मिला देने की सामर्थ्य एकमात्र गीता में ही है। अर्जुन युद्ध के प्रांगण में उपस्थित अपने पूज्य गुरु जनों एवं अपने पारिवारिक जनों को देखकर उनके वध के भय से शोकाकुल हो गया था। सघन मोह रूप मेघ ने उसके विवेक को आच्छादित कर अर्जुन को दिग्भ्रमित बना दिया था।

उसने कर्तव्य पथ को समझने के लिए भगवान श्री कृष्ण के चरण कमलों में आत्मसमर्पण कर दिया। भगवान ने दिग्भ्रान्त अर्जुन के मोह को दूर करने के लिए आत्म तत्व, निष्काम कर्मयोग, ज्ञानयोग, उनसे प्राप्त आत्म दर्शन योग, ब्रह्म तत्व, उनकी प्राप्ति का साधन, भक्ति योग तथा शरणागति योग आदि का सविस्तर उपदेश किया गीता के उपदेश से अर्जुन का मोह तथा संशय से नष्ट हो गया।

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